शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2016

दीनदयाल उपाध्याय संपूर्ण वाङ्मय, लोकार्पण - रिपोर्ट

नई दिल्ली,। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दीनदयाल उपाध्यायजी को विकल्प की राजनीति का प्रणेता बताते हुए कहा कि उनकी मजबूत नींव के सहारे ही अल्पावधि में भाजपा की विपक्ष से विकल्प तक की यात्रा संभव हुई। दीनदयालजी ने छोटे से जीवनकाल काल में एक विचार को विकल्प बना दिया।

यहाँ विज्ञान भवन में पंडित दीनदयाल उपाध्यायजी केजन्मशती वर्ष पर प्रभात प्रकाशन द्धारा प्रकशित उनके सम्पूर्णवाङ्मय का लोकार्पण करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि यह दीनदयालजी के ही अथक प्रयासों का परिणाम है कि एक राजनीतिक दल की बहुत कम समय में विपक्ष से विकल्प तक की यात्रा संभव हुई।
उन्होंने संगठन आधारित राजनीतिक पार्टी का विचार दिया और वर्ष 1967 में देश को कांग्रेस का विकल्प मिला।
इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने सेना के सामर्थ्यवान होने पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि दीनदयालजी कहते थे कि राष्ट्र की सेना अत्यंत सामर्थ्यवान होनी चाहिए तभी राष्ट्र भी सामर्थ्यवान बन पाता है। प्रधानमंत्री ने कहा कि सेना अत्यंत सामर्थ्यवान हो, हमारा देश शक्तिमान हो और भारत सामर्थ्यवान हो, यह समय की मांग है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस बार विजयादशमी का पर्व भारत के लिए खास है। अगर कोई कसरत करके अपने को स्वस्थ और सामर्थ्यवान बनाता है तो इससे पड़ोसी को डरने कि कोई जरूरत नहीं हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच इस समय सीमा पर बने भारी तनाव और सर्जिकल स्ट्राइक को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री के इस बयान को खास संदर्भ में देखा जा रहा है।   
उन्होंने कहा कि गुजरात में लोग जनसंघ का मज़ाक उड़ाते हुए कहते थे कि क्या दीवार पर दीपक बनाने से जीत जाओगे। एक वक्त था जब जनसंघ के नेता जमानत बचने पर उस पैसे से पार्टी किया करते थे। यह पंडितजी के विश्वासों और प्रयासों का ही सुपरिणाम है कि आज हमारी विचार यात्रा इस मुकाम तक आ पहुंची है।
उन्होंने कहा कि सुदर्शन चक्रधारी मोहन से चरखा धारी मोहन तक जो हम सुनते आए हैं, पंडित जी ने उसे आधुनिक अर्थों में प्रस्तुत किया है। मैं चाहूँगा कि हिंदुस्तान का विश्लेषक वर्ग अब तक की सरकारों को कसौटी पर परखे। मुझे विश्वास है कि पंडित दीनदयाल ने जिस दल को सींचा है, वह जनता की अपेक्षाओं पर अवश्य खरा उतरेगा। पंडितजी ने कहा था कि ज्ञान विज्ञान और संस्कृति सभी क्षेत्रों में अपने जीवन के विकास के लिए जो भी आवश्यक होगा हम उसे स्वीकार करेंगे। यही हमारी मूलभूत सोच है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा था कि मेरे पास दो दीनदयाल होते तो मैं देश की राजनीति का चरित्र बदल देता। उन्होंने कहा कि 1962 से 1967 के बीच देश की राजनीति में एक बड़ा खालीपन आ चुका था तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के बाद कौन, यह सवाल सबकी जुबान पर था। ऐसे मौके पर देश में कांग्रेस से इतर एक नई राजनीतिक विचारधारा को पनपने का अवसर मिल पाना पंडितजी के ही प्रयासों से संभव हो सका। स्वयं राममनोहर लोहिया ने दीनदयालजी को इस विकल्प की राजनीति शुरू करने का श्रेय दिया है और उनके इस अभूतपूर्व योगदान की प्रशंसा की है। उन्होंने कहा कि जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी तक संगठन आधारित राजनीतिक दल खड़ा करने में पंडितजी की भूमिका अहम रही। उन्होंने जो बीज बोए उसका फल आज मिल रहा है। उनके प्रयासों से देश की राजनीति में आज ऐसा मजबूत राजनीतिक विकल्प अस्तित्व में आ चुका है जो संगठन आधारित है और जो संगठन राष्ट्र के प्रति समर्पित है।
उन्होंने कहा कि एकात्म मानवदर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान के अध्यक्ष डा॰ महेश चन्द्र शर्मा संपादित 15 खंडों वाला यह वाङ्मय एक महान युगदृष्टा की विचार यात्रा, विकल्प यात्रा  और संकल्प यात्रा की त्रिवेणी है। प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्हें दीनदयालजी के दर्शन का सौभाग्य नहीं मिला लेकिन कोई भी उनके बारे में जब भी सोचता है तो उनकी सादगी की छवि उभर कर आती है।
उन्होंने कहा कि पंडित दीनदयालजी ने निर्धनता मुक्त, भेदभाव मुक्त और शोषण मुक्त समाज की कल्पना की थी। उनका व्यापक राजनीतिक चिंतन प्रमुख रूप से गरीबों पर ही केन्द्रित था। इसलिए उनके जन्मशती वर्ष को गरीब कल्याण वर्ष के रूप में मनाने का निश्चय किया गया है। इस दौरान सरकार का हर विभाग अपनी नीतिओं और कार्यक्रमों में गरीबों के कल्याण को प्रमुखता देगा। पंडित उपाध्याय का जीवन काल बड़ा नहीं था लेकिन जो वैचारिक अधिष्ठान देकर वे गए हैं वह बहुत बड़ा है। मोदी ने कहा कि पंडित दीनदयाल ने अपनी परम्पराओं और जड़ों से जुड़े रहने के बावजूद समाज और राष्ट्र के लिए उपयोगी नवीन विचारों का उन्होंने सदैव स्वागत किया।
इस अवसर पर संपूर्ण वांग्मय के संपादक डॉक्टर महेश चंद शर्मा ने विषय प्रवर्तन करते हुए दीनदयालजी व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि दीनदयाल जी ने कहा था कि स्वयंसेवक को राजनीति से अलिप्त रहना चाहिए। उनका मानना था कि वे राजनीति में राजनीति के लिए नहीं बल्कि राजनीति में संस्कृति के राजदूत थे । इस संस्कृति के राजदूतत्व को उन्होंने कैसे निभाया, उस कहानी को किंचित उकेरती है यह सम्पूर्ण वांग्मय की रचना | महेश जी ने दीनदयाल जी की दो घटनाओ द्वारा बताया की किस प्रकार पीकिंग रेडियो द्वारा नेहरु जी को अपशब्द कहने पर दीनदयाल जी ने भावपूर्ण भाषण में जनसंघ के कार्यकर्ताओं को कहा – “गाँव-गाँव जाओ, भारत के प्रधानमंत्री का अपमान भारत का अपमान है, यह भूल जाओ कि हम किस पार्टी के हैं, भारत के गौरव के लिए भारत के प्रधानमंत्री का मान करो” | दीनदयाल जी ने देश को एकात्म मानववाद का, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का, आर्थिक लोकतंत्र का, अन्त्योदय का जो दाय दिया, वह दाय खज़ाना है। यह खज़ाना उन्होंने भारत की संस्कृति से, भारत के इतिहास से, भारत के दर्शन से प्राप्त किया था |
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरकार्यवाह भैयाजी जोशी ने कहा कि 50 वर्ष पूर्व एक विचार को लेकर राष्ट्र, समाज, राजनीति को जिन्होंने एक दिशा दी, देखते-देखते विश्व में एकात्म मानवदर्शन मान्यता प्राप्त कर चुका है | इस ऐतिहासिक कार्य के लिए डॉ. महेश चन्द्र शर्मा व् एकात्म मानवदर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान को बधाइयाँ | पंडित जी एकात्म मानवदर्शन समस्त मानवजाति के कल्याण के मार्ग को प्रशस्त करता है | 
भैया जी ने कहा कि भारत की शक्ति कभी भी विध्वंशक या संहारक नहीं ही, भारत की शक्ति साम्राज्यवादी व् विस्तारवादी नहीं है | हमने लोगों को पराजित करने के बजाय लोगों को जीतने पर विश्वास रखा है | जब हम भौगोलिक इकाई हिंदुस्तान की बात करते हैं तो स्वाभाविक रूप से जो भूमिका भारत को निभानी है वो भारत सुरक्षित होना चाहिए, उसकी सीमाएं सुरक्षित होनी चाहिए |
उन्होंने कहा कि हमने नए विचारों को सुना पर स्वीकार तब किया, जब वह मानव कल्याण के विचार बने। दीनदयाल जी का मानव दर्शन व्यक्ति की बुनियादी जरुरत पूरा करने पर केंद्रित था। उसी के क्रियान्वयन में आज नेतृत्व लगा हुआ है।समाज के बारे में वह सहकारिता को उत्तम साधन मानते थे। इसी सूत्र की रक्षा करना हमारी जिम्मेदारी बनती है। हमे अहंकार नहीं बल्कि स्वभिमान है कि हमारे पास विश्व को देने के लिए बहुत कुछ है। भारत की शक्ति मार्गदर्शन की शक्ति है जो विश्व को दिशा देना चाहती है।
इस अवसर पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि 15 खण्डों का यह सम्पूर्ण वांग्मय निश्चित रूप से न केवल भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं के लिए बल्कि सामाजिक जीवन तथा राजनीतिक क्षेत्र में काम करने वाले हरेक कार्यकर्ता के व्यक्तिव का विकास अगर करना है और राजनीति में काम किस तरह से जलकमलबद्ध रह कर किया जा सकता है, अगर वह ढूँढना है तो इन 15 खण्डों में सरलता से उसकी प्राप्ति होगी | वह मानते है कि दीनदयाल जी एक कुशल चिंतक, विचारक, संगठनकर्ता के साथ एक सफल राजनेता भी थे। उनके कालखंड में जनसंघ ने प्रगति ही की। उन्होंने सिद्धांत और राष्ट्रवाद की राजनीति की थी और हमारा कर्तव्य है कि हम उसे आगे लेकर जाएं। यह सौभाग्य है कि आज उनकी जन्मशताब्दी वर्ष पर देश में भाजपा की सरकार है।मोदी के नेतृत्व में यह सरकार कल्याण के कार्य कर रही है जिससे भारत प्रगति की ओर बढ़ रहा है। उनके प्रयासों का ही नतीजा है कि भारत विश्व में गौरवशाली राष्ट्र के रुप में उभरा है। दीनदयाल जी की दूरदर्शिता के बारे में उन्होंने कहा कि भविष्य में आने वाली समस्यायों के बारे में उन्हें पहले ही पता चल गयाथा।दीनदयाल जी की शब्ददेह देने के लिएसंग्रह के संकलनकर्ता डॉ महेश चन्द्र शर्मा को हार्दिक आभार तथा “एकात्म मानवदर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान” को इस ऐतिहासिक कार्य के लिए साधुवाद ।
इस मौके दीप प्रज्ज्वलन प्रधानमंत्री श्री मोदी, भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, संघ के सरकार्यवाह भैयाजी जोशी और एकात्म मानवदर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान के अध्यक्ष डा॰ महेश चन्द्र शर्मा ने किया। कार्यक्रम का संचालन एकात्म मानवदर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान के सचिव श्री अतुल जैन ने किया। इस अवसर पर दीनदयालजी पर एक लघु फिल्म भी दिखाई गई जिसके माध्यम से दीनदयालजी की जीवन यात्रा और उनके एकात्म मानव दर्शन पर प्रकाश डाला गया।      

इनबॉक्स
वाङ्मय के बारे में
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दीनदयाल उपाध्याय संपूर्ण वाङ्मय कुल मिलाकर 15 खंडों में संपादित किया गया है। संपादक हैं एकात्म मानवदर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान के अध्यक्ष डा॰ महेश चन्द्र शर्मा। डा॰ शर्मा इससे पूर्व दीनदयाल उपाध्याय कर्तृत्व एवं विचार विषय पर शोध कर चुके हैं।
इस वाङ्मय में वर्ष 1940 में दीनदयालजी के राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में प्रचारक बनाने से लेकर वर्ष 1968 में उनकी हत्या तक के संपूर्ण कृतित्व को समाहित किया गया है। सुविधा और स्पष्टता के लिए इन 15 खंडों को अलग अलग कालावधि में विभाजित किया गया है। इस अवधि में देश में घटी विभिन्न घटनाओं पर दीनदयालजी के विचारों और उनके प्रेरित आंदोलनों के विवरणों को समाहित किया गया है। इनके जरिए तत्कालीन राजनीतिक उथल पुथल को गहराई से समझा जा सकता है। 
वाङ्मय के खंड एक में वर्ष 1940 से 1950 तक एक दशक की सामग्री प्रकाशित की गई है। खंड दो में वर्ष 1951-52 और 1953 की गतिविधिओं को शामिल किया गया है। खंड तीन वर्ष 1954-1955, खंड चार 1956-1957, खंड पाँच एवं छह 1958 से संबन्धित हैं। खंड सात वर्ष 1959, खंड आठ 1960, खंड नौ 1961, खंड दस 1962, खंड ग्यारह 1963-64, खंड बारह 1965, खंड तेरह 1966 और खंड चौदह 1967-68 से संबन्धित है। खंड पंद्रह में उनके कई बौद्धिक वर्गों और उनकी हत्या से संबन्धित सामग्री शामिल की गई है।

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Prabhat Prakashan

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