शनिवार, 11 जून 2016

साप्ताहिक समूह चर्चा - वृक्षारोपण एवं पर्यावरण संरक्षण

वृक्षारोपण एवं पर्यावरण संरक्षण
भारतीय संस्कृति और भारतीय जीवन व्यवस्था में पर्यावरण संरक्षण निहित है ।

 10 जून- पर्यावरण संरक्षण एवं वृक्षारोपण विषय पर विश्व संवाद केंद्र उदयपुर पर आयोजित समूह चर्चा में समाज के प्रबुद्धजन ने अपने विचार व्यक्त करते हुए, समाज द्वारा हो रहा प्राकृतिक संसाधनों के शोषण पर चिंता व्यक्त की। अधिक से अधिक पौधो को लगा उसे पूर्ण वृक्ष बनने तक उसकी साल संभाल करने का आवाहन किया। चिपको आंदोलन जैसा ही राजस्थान में खेजलडी के पेड़ो को बचाने के लिए अमृता देवी के संरक्षण में जो आंदोलन चला था उसे भी याद किया गया, इसी घटना के उदाहरण से प्रेरितअपना संस्थानके द्वारा पेड़ लगाये जाने के अभियान को सराहा गया।

         भारतीय मूल संस्कृति के हर कार्य में पर्यावरण संरक्षण का भाव है और कालांतर में भोगवाद एवं विलासिता के चलते हमारी व्यवस्थाएं खण्डित हो गयी। पुराने किलो एवं महलो को देखके लगता है किस तरह, भारतीय निर्माण तकनीकी एक उन्नत तकनीकी थी जो पयार्वरण को ध्यान में रखती थी। हमारे वास्तु शास्त्र में भी यही सब बाते निहित है।

          सम्पूर्ण विश्व जहा प्रदूषण की समस्या से जूझ रहा है। हम अनेक तरह के पेड़-पौधे लगाकर कुछ हद तक निजात पा सकते है। वैज्ञानिक प्रयोगों से भी सिद्ध हो चुका है पीपल, बरगद जैसे वृक्ष छाया के अलावा हवा को भी शुद्ध कर पर्यावरण सन्तुलन मे विशेष भूमिका निभाते हैं । ऐसे में वृक्षा रोपण कर हम आने वाली पीढ़ी के लिये पर्यावरण को संरक्षित कर सकते है।

          शुद्ध जल आज विश्व की बहुत बड़ी समस्या है, पृथ्वी पर 70% जल होने का बाद भी पेयजल मात्र 1% है। ऐसे में जल का संरक्षण बहुत जरूरी है। वक्ताओं ने विषय बोलते हुए मेहमानो को लौटे व गिलास से पानी पीने पिलाने के महत्व को बताया। आज यदि घर में 5 मेहमान आते है तो घरवाले एक ट्रे में 5 गिलास पानी लेकर आते है। पांचो मेहमान मुह लगाकर पानी पीते है और आधा गिलास पानी छोड़ देते है। मेहमानों के जाने के बाद गिलासों में बचा शुद्ध पेयजल को व्यर्थ ही बहा दिया जाता है और जूठे गिलासों को धोने में और तीन गिलास पानी व्यर्थ कर दिया जाता है। दूसरी और यदि मेहमानो के समक्ष हम लौटे में पानी और गिलास लेकर जाएंगे तो, मेहमान उतना ही पानी भरने को कहेगा जितना उसे चाहिए ऐसे में आप ही गणित लगा लीजिये आप कितना पानी भारतीय व्यवस्थाओ के कारण बचा पायेंगे ।
 - राहुल राठौड़

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