गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

असहिष्णुता की साजिश पर प्रफुल्ल मेहता

देश असहिष्णुता की साजिश में तो नहीं!:इक बात मेरे दिल की
Proful Mehta

भारत का मीडिया भारत की सहिष्णुता , स्वतन्त्रता का भरपूर आनंद ले रहा लगता है। यदि भारतीय मीडिया की बात करे तो उसको देख कर लगता है इस देश के हालात नर्क से भी बदतर है। कई बार यह लगने लगता है कि यह दुस्प्रचार शायद विदेशी मीडिया कर रहा मगर कर भारतीय मीडिया रहा है।  अगर आप मीडिया की इस थोपे हुए विचार से ताल्लुक नहीं रखते तो आप असहिष्णु है।  मीडिया ने जो कह दिया वही सच है, आपको मानना ही पड़ेगा।
सहिष्णु और असहिष्णु का ज्वार भाटा चुनावो के दौरान अपने चरम पर था चुनाव सम्पन्न हुए और यह बैठ गया।  कल आमिर खान ने  अपनी पत्नी किरण की चिंता को जग जाहिर किया तो फिर से असहिष्णु की ठंडी हुई चिता प्रज्ज्वलित हो उठी।  आमिर  आपकी इस बात ने लिखने को मजबूर कर दिया।  "सत्यमेव जयते" आखिर है क्या खान भाई ? क्या खान भाई को भी ऐसा ही लगा ? और नहीं लगा तो उन्होंने अपनी पत्नी का ब्रेन वाश किया या नहीं ? भारत और भारतीयता , राष्ट्र के प्रति कर्तव्यबोध का ज्ञान घर में दिया या नहीं ? और ऐसा क्या हुआ की किरण को अचानक भारत असहिष्णु लगने लगा ?

आमिर आपको भारत और भारत की जनता ने इतना दे दिया है कि उसको लेकर पड़ोसी  देश या अन्य कही भी आप जा सकते थे अपनी पत्नि को सहिष्णु जमात में लेकर।  फिर इतनी देर क्यों कर रहे है आप। हाँ, मुझ जैसे छोटे आदमी को मेरे शहर से दूसरे शहर भी शिफ्ट होना हो तो सपना देखना भी दूभर है स्थान परिवर्तन का तो सोच ही नहीं सकता और ऐसा एक प्रतिशत कारण भी नहीं लगता क्योंकि भारत के जिस शहर में मैं हूं वही मेरी चिता जले ऐसी ही ख्वाहिश मेरी है। 

इस देश में तथाकथित बुद्धिजीवियों की बुद्धि में असहिष्णु शब्द की ज्ञान की गंगा का कैसे प्रादुर्भाव हुआ यह अपने आप में कठिन प्रश्न है। असहिष्णु तबका तो अपनी बुद्धि से हकीकत को जानता ही है  मगर मीडिया कब समझेगी यह अभी भविष्य के गर्त में है।

हिन्दुस्तान के  गर्वित इतिहास संस्कृति  का पुरे विश्व में अपना स्थान है पर मीडिया है कि उसे यह हज़म नहीं  हो रहा है।  राष्ट्र के प्रति कर्तव्यबोध से तो इन्होने शायद किनारा कर रखा है ,राष्ट्रीयता इनके शब्दकोष में ढूँढना बहुत मुश्किल सा कार्य होगा। इनकी नज़रे वह नज़ारे दिखाना चाहती है जो  सच्चाई से परे है। 

पिछले कुछ समय से वातानुकुलित  कमरों  में बसने  वालों जिनको इस देश के गाँव,गलियों,मौहल्ले , शहरों की जमीनी हकीकत का भान तक नहीं , जिन्होंने आम जनता की जिंदगी को देखा तक नहीं उस जिंदगी को जीना तो दूर की बात। यह सब ऐसी मुहीम क्यों चला रहे है क्या इस देश की सहिष्णुता को असहिष्णुता में बदलने की कोई सोच समझी साजिश तो नही?
Source: Navbharattimes

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