सोमवार, 31 अगस्त 2015

संस्कृत के कारण ही भारत एक है - डॉ. महेश शर्मा

नई दिल्ली. मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार के मार्गदर्शन तथा राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के कुलपति, प्रसिद्ध शिक्षाविद् प्रो. परमेश्वर नारायण शास्त्री की अगुवाई में संस्कृत के चौदह संस्कृत सेवी संस्थाओं के चिंतन-सहयोग से “संस्कृत सप्ताह उत्सव” का शुभारम्भ 26 अगस्त को नई दिल्ली स्थित मावलंकर प्रेक्षागृह में में हुआ. इसमें बतौर मुख्य अतिथि श्री एस. रामदुरई, अध्यक्ष राष्ट्रीय कौशल विकास निगम दिल्ली, सारस्वत अतिथि प्रो. अनिल डी. सहस्रबुद्धे, अध्यक्ष अखिल भारतीय तकनीकि शिक्षा परिषद् दिल्ली तथा अध्यक्ष डॉ. महेश शर्मा राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के रूप में उपस्थित रहे.
इस अवसर पर देश के तीन संस्कृत विद्वानों जिनका जीवन अर्जन का सीधा कार्यक्षेत्र संस्कृत नहीं है लेकिन संस्कृत के विकास एवं प्रचार में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान ऐसे डॉ. अम्बाकुलकर्णी, हैदराबाद, श्री के. लक्ष्मीनरसिंहन, तमिलनाडु तथा डॉ. जयन्तकुमारदीर्घांगी, अमेरिका को “संस्कृत सेवाव्रती सम्मान” से विभूषित किया गया. इस सम्मान में रु. 1,00,000/- के साथ-साथ शाल तथा सनद भी प्रदान की गयी. ग़ौरतलब है कि जहाँ डॉ. अम्बाकुलकर्णी ने संस्कृत संगणक भाषा विज्ञान में अपना महनीय योगदान दिया है, वहीं श्री लक्ष्मीनरसिंहन ने इंजीनियरिंग के क्षेत्र से होते हुए भी संस्कृत केवलं संस्कृतमाध्यमेन परियोजना के माध्यम से संस्कृत की जीवंतता को उजागर करने का सार्थक प्रयास किया है. डॉ. जयन्तकुमारदीर्घांगी फिलहाल अमेरिका में चर्चित चिकित्सक हैं. लेकिन वैदिक विद्या को प्रकाशित करने में उनका महनीय योगदान हैं. डॉ.जयन्तकुमारदीर्घांगी भारत में आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्ग के लिए आयुर्वेद तथा आधुनिक चिकित्सा पद्धति को मिला कर अस्पताल खोलने की दिशा में संलग्न हैं. संस्थान के कुलपति प्रो. परमेश्वर नारायण शास्त्री ने मंचस्थ अतिथियों के समक्ष इन तीनों विद्वानों को शाल एवं सम्मान राशि से नवाज़ा.
भारी संख्या में आये संस्कृत प्रेमियों को संबोधित करते हुए विख्यात चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. महेश शर्मा ने कहा कि आज हमारे देश में तकरीब़न 1200 भाषाएँ हैं, फिर भी भारतवर्ष एक है, इसका बहुत बड़ा कारण यह भी है कि संस्कृत भाषाओं की जननी है. लेकिन साथ ही साथ डॉ. शर्मा ने आश्चर्य जताते हुए यह भी कहा कि संस्कृत भाषाओं की जननी होते हुए भी इसके बारे में बार-बार आखिर क्यों याद दिलाना पड़ता है? और मीडिया के माध्यम से इसकी उपयोगिता पर सवालिया निशान क्यों उठाया जाता है? वहीं श्री रामदुरई ने कांची के शंकराचार्य के हवाले कहा कि वाकई में संस्कृत सभी के लिए है. साथ ही साथ उन्होंने राधकृष्णन तथा डॉ. ए.पी.जे.अब्दुल कलाम के संस्कृत के प्रति रुझान के भाव को भी साफ किया.
प्रो. सहस्रबुद्धे ने साफ तौर पर कहा कि संस्कृत अपने आप में ज्ञान का अकूत खज़ाना है और इसमें निहित ज्ञान विज्ञान को न केवल पारंपरिक बल्कि आधुनिक सन्दर्भ में सोचने, समझने एवं पढ़ने की ज़रूरत है. इस लिहाज़ से उन्होंने प्राचीन भारतीय धतु विज्ञान का जिक्र करते हुए महान शासक अशोक के स्तम्भों की भी चर्चा की. साथ ही साथ उन्होंने विद्यालयीय स्तर पर संस्कृत की पढ़ाई के महत्त्व पर बल दिया.
कार्यक्रम में उपस्थित छात्रा-छात्राओं तथा अन्य संस्कृत प्रेमियों का स्वागत करते हुए प्रास्ताविक भाषण में श्री चमू कृष्ण शास्त्री, वरिष्ठ परामर्शदाता (भाषाएँ), मानव संसाध्न विकास मंत्रालय, भारत सरकार ने कहा कि आज संस्कृत को न केवल भारतवर्ष में बल्कि पूरी दुनिया में पहुँचाने की ज़रूरत है, ताकि इसमें निहित नॉलेज इकॉनमी का लाभ पूरी दुनिया को मिले. साथ ही साथ उन्होंने यह भी कहा कि इस वर्ष इस संस्कृत सप्ताह का आयोजन इस मायने में भी विशिष्ट कहा जा सकता है कि इसमें कई महत्त्वपूर्ण संस्कृतसेवी संस्थाओं के सामूहिक चिन्तन से इसको अधिकाधिक सफल बनाने का भरसक प्रयास किया गया है.
इस भव्य समारोह में आकर्षण का केन्द्र कुछ महत्त्वपूर्ण वेद एवं काव्यशास्त्रीय किताबों के विमोचन के साथ साथ ऑडियो वीडियो का लोकार्पण भी रहा. इस सिलसिले में अमरवाणी-गीतावलीसान्द्रमुद्रिका भी ग़ौरतलब है. इनमें संग्रहीत गीतों का गायन शंकरमहादेवन्, सुजाता, मधुबालकृष्ण, हरिणी, कल्पना राघवेन्द्र, अरुणा सायीराम, रमेश विनायक तथा कार्त्तिका जैसे लोकप्रिय गीतकारों ने किया है तथा पद्यश्री मोहनलाल ने इसकी भूमिका प्रस्तुत की है.
इस समारोह में संस्कृत के कई नामचीन संस्कृत विद्वान भी मौजूद थे. इनमें दिल्ली विश्वविद्यालय तथा जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के विभागाध्यक्ष क्रमशः प्रो. रमेश भारद्वाज तथा प्रो. सी. उपेन्द्रराव के अलावा प्रो. रमेश कुमार पाण्डेय तथा प्रो. श्रीधर वशिष्ठ क्रमशः वर्तमान तथा पूर्व कुलपति, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ, दिल्ली, आचार्य रमाकान्त शुक्ल, देववाणी परिषद्, दिल्ली तथा नाट्यशास्त्र के विख्यात विद्वान प्रो. के.डी. त्रिपाठी के साथ संस्थान के कुलसचिव डॉ. बिनोद कुमार सिंह भी मौजूद थे. इस साप्ताहिक कार्यक्रम के संयोजक प्रो. मनोज कुमार मिश्र ने समारोह को लेकर अपना संतोष जताया.
जनसंपर्क विभाग के प्रभारी डॉ. अजय कुमार मिश्र ने बताया कि संस्कृत साप्ताहोत्सव के अन्य कार्यक्रम से 01 सितम्बर तक राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान में चलेंगे.

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