बुधवार, 1 अप्रैल 2015

अभिव्यक्ति की आजादी

आइटी एक्ट की धारा 66ए रद किए जाने पर रोहित कौशिक की टिप्पणी

कुछ टिप्पणियों और क्रियाकलापों से क्या वास्तव में हमारी भावनाएं आहत होती हैं या फिर हम भावनाएं आहत होने का नाटक करते हैं 

 

यह सुखद है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक लगाने वाले आइटी एक्ट की धारा 66ए को असंवैधानिक ठहराते हुए निरस्त कर दिया है। इस धारा के तहत पुलिस को सोशल मीडिया पर तथाकथित आपत्तिजनक विचार लिखने वालों को गिरफ्तार करने का अधिकार मिला हुआ था, हालांकि विवादित पोस्ट करने वालों पर आइपीसी की धाराओं के तहत कार्रवाई हो सकती है। पिछले कुछ वषों से इस कानून के दुरुपयोग के मामले बढ़ते जा रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति के अधिकार, असहमति के अधिकार और जानने के अधिकार का उल्लंघन बताते हुए कहा कि यह धारा नागरिकों को हतोत्साहित करती है। हालांकि इस फैसले से यह अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए कि हम सोशल मीडिया पर कुछ भी लिखने के लिए स्वतन्त्र हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि हम जानबूझकर किसी को नीचा दिखाने या धार्मिक भावनाओं को आहत करने के लिए सभी हदें पार कर दें। पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया पर अपने विचारों को पोस्ट करने पर सबसे बड़ा आरोप यह लगता था कि संबंधित व्यक्ति या लोगों की आस्था पर हमला हुआ है। यह न जानते हुए भी कि आखिर आस्था क्या है।

हमारी आस्था कुछ संगठनों और चंद नेताओं की बपौती नहीं हो सकती। आस्था पर हमले जैसे आरोपों का सहारा लेकर ही कभी लेखकांे को डराया-धमकाया जाता है तो कभी चित्रकारों और कलाकारों को। पिछले दिनों सोशल मीडिया पर अपने विचार पोस्ट करने पर दलित लेखक कंवल भारती को जिस तरह से गिरफ्तार किया गया वह किसी से छिपा नहीं है। बाल ठाकरे की अंतिम यात्र के समय मुंबई बंद को लेकर शाहीन नामक एक छात्र ने जब फेसबुक पर टिप्पणी की थी और इस टिप्पणी को रेणु श्रीनिवासन नामक छात्र ने पसंद किया था तो उस समय दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया था। दरअसल हमारी आस्था या फिर भावना एक विश्वास पर आधारित होती है। जब कोई इस विश्वास पर चोट पहुंचाने की कोशिश करता है तो हमारी भावनाएं आहत होती हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि कुछ टिप्पणियों और क्रियाकलापों से क्या वास्तव में हमारी भावनाएं आहत होती हैं या फिर हम भावनाएं आहत होने का नाटक करते हैं? अक्सर यह देखा गया है कि हम परंपरा से हटकर कुछ भी देखना या सुनना नहीं चाहते हैं। हमारे समाज का एक वर्ग जिसमें हंिदूू और मुसलमान दोनों ही शामिल हैं ऐसे क्रियाकलाप के विरुद्ध सड़कों पर भी उतर आता है। यह वर्ग सड़कों पर जाम लगाने तथा तोड़फोड़ करने से भी गुरेज नहीं करता है। भावनाएं आहत होने के नाम पर ऐसे क्रियाकलाप संचालित करते हुए हम यह नहीं सोचते हैं कि जाम और तोड़फोड़ से प्रभावित लोगों की भावनाएं भी आहत हो सकती हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि ज्यों-च्यों हमारे समाज में शिक्षा का दायरा बढ़ रहा है, त्यों-त्यों हमारी मानसिकता भी संकुचित होती जा रही है। यही कारण है कि हम अपनी भावनाएं आहत होने पर तो हल्ला मचाने लगते हैं, लेकिन दूसरों की भावनाओं का ख्याल नहीं रखते हैं। ऐसी स्थिति में भावनाएं आहत होने पर हल्ला मचाना खोखला आदर्शवाद लगने लगता है। दरअसल धारा 66ए के रद होने के बाद भी अन्य धाराओं में गिरफ्तारी की गुंजाइश है इसलिए हमें गंभीरता के साथ कुछ बातों पर विचार करने की जरूरत है । सभी धर्मग्रंथों में लिखी गई बातें अपने समय के प्राप्त सत्य हैं। ऐसा किसी धर्मग्रंथ में नहीं लिखा गया है कि इसके बाद कोई और सत्य प्रकट नहीं होगा। इसलिए धर्म भी आचार-व्यवहार का कोई ऐसा अंतिम आख्यान नहीं है कि जिस पर टिप्पणी न की जा सके। यह दुर्भाग्यपूर्ण है हम धर्म आधारित सभी बातों को आंख मूंदकर मान लेते हैं और इसके अलावा कुछ सुनना नहीं चाहते हैं।

इस कानून के समाप्त होने पर कुछ राजनेता आपत्ति जता रहे हैं। यह कानून रद होने के बाद अन्य धाराओं में गिरफ्तारी की कोशिशें भी की जाएंगी। कानून बनते और रद होते रहेंगे, ऐसे मामलों पर असली समझदारी तो समाज को ही दिखानी होगी।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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