शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

एक महत्वपूर्ण लेख : राज्यसभा का दुरुपयोग

[लेखक हृदयनारायण दीक्षित, उप्र विधान परिषद के सदस्य हैं] - See more at: http://www.jagran.com/editorial/apnibaat-12228049.html?src=HP-EDI-ART#sthash.pPdT5elD.dpuf
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‘जनगणमन’ संप्रभु है और चुनावी जनादेश भारत के मन की लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले राजग को करोड़ों मतदाताओं ने प्रचंड बहुमत से सत्ता सौंपी। उनके नेतृत्व, घोषणापत्र व आश्वासनों पर विश्वास किया। विपक्ष को उसकी औकात बताई। उसे सुझाव व आलोचना का सीमित दायित्व दिया। मोदी जन-अभिलाषा के अनुरूप तेज रफ्तार चले। सरकारी तंत्र की निद्रा टूटी, नई कार्य संस्कृति आई। बेहतर और त्वरित परिणाम के लिए नए विधायन की आवश्यकता होती ही है। विपक्ष ने भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक सहित कई महत्वपूर्ण विधेयकों को सतही राजनीति का मुद्दा बनाया।
विवश सरकार के समक्ष अध्यादेशों का ही विकल्प बचा। नि:संदेह अध्यादेशों का प्रख्यापन गंभीर परिस्थितियों में ही होता है, लेकिन राष्ट्रीय विकास के काम में विपक्षी अड़ंगों से निपटने का और कोई विकल्प था ही नहीं। राज्यसभा के सदस्य स्वयं ही राज्यों के प्रतिनिधि होते हैं, लेकिन एक महत्वपूर्ण विधेयक के विरोध में राज्यसभा के सदस्यों ने मनोरंजक बात कही कि इसमें राज्यों से परामर्श जरूरी है। राज्यसभा में सरकार के कामकाज में बाधा डालने वाले ऐसे अनेक अवसर आए हैं। मूलभूत प्रश्न है कि प्रचंड बहुमत के बावजूद सरकार को अपनी नीति व कार्यक्रम लागू करने का अधिकार क्यों नहीं है?
संविधान निर्माताओं ने ब्रिटिश संसदीय परिपाटी अपनाई है। ब्रिटेन की संसद में दो सदन हैं-हाउस ऑफ कामंस और हाउस ऑफ लार्डस। भारत में भी दो सदन हैं-लोकसभा और राज्यसभा। पहले ब्रिटेन में दोनों सदनों के अधिकार समान थे। सरकार को दिक्कतें हुईं। 1911 में लार्ड सभा के निर्णायक अधिकार घटाए गए। 1949 में लेबर पार्टी ने नया पार्लियामेंट एक्ट पारित करवाया। व्यवस्था हुई कि उच्च सदन की असहमति के बावजूद लोक सदन से एक वर्ष में दूसरी बार पारित विधेयक विधिवत पारित माना जाएगा। द्वितीय सदन की अपनी उपयोगिता है, लेकिन विधायी कार्य में विधि निर्वाचित सरकार की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती। भारत के 24 राज्यों में दो सदन नहीं हैं, सिर्फ सात राज्यों में विधान परिषदें हैं। परिषद की असहमति के बावजूद विधानसभा द्वारा दूसरी बार पारित विधेयकों को पारित मान लिया जाता है। यहां ब्रिटिश परंपरा का अनुसरण है। भारतीय संसद में दोनों सदनों की असहमति के बाद संयुक्त अधिवेशन के विधान हैं। जापान की संसद डायट में दो सदन हैं। निम्न सदन द्वारा पारित विधेयक दूसरे सदन की असहमति के बावजूद निम्न सदन के दो तिहाई बहुमत से पारित माना जाता है। फ्रांस में भी अंतत: जनप्रतिनिधि सदन की ही विधायी अधिकारिता है। ब्रिटेन, कनाडा, जापान और फ्रांस विधायी कार्यो में जन-निर्वाचित सदनों को प्राथमिकता देते हैं।
भारत की संविधान सभा ने गहन विचार के बाद द्विसदनीय संसद बनाई। तब लोकसभा और राज्यसभा में असहमति की कोई कल्पना भी नहीं थी। तब दलीय प्रतिबद्धता की तुलना में राष्ट्र सवरेपरि था। संविधान निर्माताओं ने बजट सहित सभी धन विधेयकों के लिए लोकसभा को ज्यादा अधिकार संपन्न बनाया। लोकसभा के बहुमत को ही सरकार चलाने का आधार बनाया गया। लोकसभा को ही अविश्वास प्रस्ताव रखने का अधिकार मिला। राज्यसभा ने अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। संसदीय परंपरा के विकास में इस सदन का महत्वपूर्ण योगदान है। संविधान सभा (3 जनवरी 1949) में इस सदन को बनाने पर विवाद हुआ था। लोकनाथ मिश्र (उड़ीसा) ने द्वितीय सदन का विरोध किया था। एम. अनंत शयनम् आयंगर (मद्रास) ने कहा था कि हम विभिन्न लोगों को राजनीति में भाग लेने का मौका दें। इसलिए दूसरा सदन जरूरी है। अगर निचला सदन आवेश में कोई कानून तुरंत पास करता है तो ऊपरी सदन तक उसके पहुंचने तक बीच में आए समय व्यवधान से आवेश का प्रशमन होगा और कानून पर सही विचार होगा। लेकिन आज की स्थिति भिन्न है। मोदी सरकार ने हड़बड़ी या आवेश में विधेयक नहीं बनाए। लोकसभा ने उन्हें किसी आवेश में नहीं पारित किया। विपक्षी दल ही आवेश में हैं। विधेयक के गुण-दोष पर चर्चा है ही नहीं। सरकार को पराजित करना ही मुख्य लक्ष्य हो गया है। दूसरा सदन वरिष्ठ है। यहां नीर, क्षीर, विवेक का काम होना चाहिए। दुनिया के आधे देशों में दूसरे सदन नहीं हैं। चीन, अंगोला, आर्मेनिया, बुल्गारिया, मध्य अफ्रीकी गणतंत्र, न्यूजीलैंड, मारीशस, लीबिया, लेबनान, उत्तर व दक्षिण कोरिया, ग्रीस, मिस्न, टर्की, डेनमार्क, पुर्तगाल और श्रीलंका सहित अनेक देशों में एकसदनीय व्यवस्था है। भारत की द्विसदनीय व्यवस्था बेशक अच्छी है, लेकिन विपक्ष इसका सदुपयोग नहीं कर रहा है।
राज्यसभा धीर-गंभीर सदन है। संकीर्ण दलीय लड़ाई का मंच नहीं। यह गहन विचार-विमर्श का सभा मंडप है। उसने जन-आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व किया भी है। संविधान के कृपा प्रसाद और जनादेश से विधि निर्वाचित सरकार को काम करने का अवसर दिया जाना चाहिए। यहां विराजमान अधिकांश सदस्य अनुभव और वरिष्ठता में बेजोड़ हैं। उन्हें सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों को तेज रफ्तार गतिशील करने की प्रेरणा देनी चाहिए। भाजपा से किसी की भी असहमति हो सकती है। होनी भी चाहिए। जनतंत्र में असहमतियां होती भी हैं, लेकिन आदर्श जनतंत्र में सहमति और असहमति का द्वंद्व नहीं ‘मिलन’ होना चाहिए। यही राष्ट्रहितैषी होता है। बेशक हां और न का साथ नहीं हो सकता, लेकिन दो और दो को चार कहने में हां और न का संघर्ष बेमतलब है?
सर्वानुमति और सबका साथ जनतंत्री आदर्श है, लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य मुद्दा आधारित सोच का नहीं है। बेशक सभी दल राष्ट्र हितैषी हैं। लेकिन सबकी अपनी राजनीति है। कानून निर्माण में राजनीति चलाने की आवश्यकता नहीं होती। संसदीय कानून बनाना पूरे भारत को एक विशेष व्यवस्था व संयम नियम में बांधना है। इसे वोट बैंक राजनीति से नहीं जोड़ा जा सकता। सत्तादल को अपने नीति, कार्यक्रम चलाने और व्यवस्था में जरूरी बदलाव लाने के अधिकार जनता ही देती है। ऐसे बदलाव जनविरोधी होंगे तो जनता उसे दंडित करेगी ही। जनादेश प्राप्त सरकार के हरेक काम में अडं़गा डालने का सीधा अर्थ है-देश के करोड़ों लोगों की भावना व जनादेश का अपमान। विपक्षी दल स्वयं को प्रगतिशील कहते हैं। परंपरा से भी आगे निकलने वाली गति प्रगति है। अड़ंगेबाजी प्रगति नहीं। ब्रिटिश जन पक्के परंपरावादी हैं, तो भी उन्होंने अपनी संसदीय परंपरा का प्रगतिशील विकास किया। भारत को भी समय की चुनौती अनुरूप गहन विचार विमर्श करना चाहिए। संप्रति राजनीतिक सुधारों के साथ संसदीय परिपाटी और विधायी परंपरा के एक एक बिंदु पर व्यापक राष्ट्रीय बहस की आवश्यकता है। राष्ट्र अधीर है। उसे काम चाहिए और काम के परिणाम भी चाहिए।
(लेखक उप्र विधान परिषद के सदस्य हैं)
‘जनगणमन’ संप्रभु है और चुनावी जनादेश भारत के मन की लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले राजग को करोड़ों मतदाताओं ने प्रचंड बहुमत से सत्ता सौंपी। उनके नेतृत्व, घोषणापत्र व आश्वासनों पर विश्वास किया। विपक्ष को उसकी औकात बताई। उसे सुझाव व आलोचना का सीमित दायित्व दिया। मोदी जन-अभिलाषा के अनुरूप तेज रफ्तार चले। सरकारी तंत्र की निद्रा टूटी, नई कार्य संस्कृति आई। बेहतर और त्वरित परिणाम के लिए नए विधायन की आवश्यकता होती ही है। विपक्ष ने भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक सहित कई महत्वपूर्ण विधेयकों को सतही राजनीति का मुद्दा बनाया। विवश सरकार के समक्ष अध्यादेशों का ही विकल्प बचा। नि:संदेह अध्यादेशों का प्रख्यापन गंभीर परिस्थितियों में ही होता है, लेकिन राष्ट्रीय विकास के काम में विपक्षी अड़ंगों से निपटने का और कोई विकल्प था ही नहीं। राज्यसभा के सदस्य स्वयं ही राज्यों के प्रतिनिधि होते हैं, लेकिन एक महत्वपूर्ण विधेयक के विरोध में राज्यसभा के सदस्यों ने मनोरंजक बात कही कि इसमें राज्यों से परामर्श जरूरी है। राज्यसभा में सरकार के कामकाज में बाधा डालने वाले ऐसे अनेक अवसर आए हैं। मूलभूत प्रश्न है कि प्रचंड बहुमत के बावजूद सरकार को अपनी नीति व कार्यक्रम लागू करने का अधिकार क्यों नहीं है?
संविधान निर्माताओं ने ब्रिटिश संसदीय परिपाटी अपनाई है। ब्रिटेन की संसद में दो सदन हैं-हाउस ऑफ कामंस और हाउस ऑफ लार्डस। भारत में भी दो सदन हैं-लोकसभा और राज्यसभा। पहले ब्रिटेन में दोनों सदनों के अधिकार समान थे। सरकार को दिक्कतें हुईं। 1911 में लार्ड सभा के निर्णायक अधिकार घटाए गए। 1949 में लेबर पार्टी ने नया पार्लियामेंट एक्ट पारित करवाया। व्यवस्था हुई कि उच्च सदन की असहमति के बावजूद लोक सदन से एक वर्ष में दूसरी बार पारित विधेयक विधिवत पारित माना जाएगा। द्वितीय सदन की अपनी उपयोगिता है, लेकिन विधायी कार्य में विधि निर्वाचित सरकार की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती। भारत के 24 राज्यों में दो सदन नहीं हैं, सिर्फ सात राज्यों में विधान परिषदें हैं। परिषद की असहमति के बावजूद विधानसभा द्वारा दूसरी बार पारित विधेयकों को पारित मान लिया जाता है। यहां ब्रिटिश परंपरा का अनुसरण है। भारतीय संसद में दोनों सदनों की असहमति के बाद संयुक्त अधिवेशन के विधान हैं। जापान की संसद डायट में दो सदन हैं। निम्न सदन द्वारा पारित विधेयक दूसरे सदन की असहमति के बावजूद निम्न सदन के दो तिहाई बहुमत से पारित माना जाता है। फ्रांस में भी अंतत: जनप्रतिनिधि सदन की ही विधायी अधिकारिता है। ब्रिटेन, कनाडा, जापान और फ्रांस विधायी कार्यो में जन-निर्वाचित सदनों को प्राथमिकता देते हैं।
भारत की संविधान सभा ने गहन विचार के बाद द्विसदनीय संसद बनाई। तब लोकसभा और राज्यसभा में असहमति की कोई कल्पना भी नहीं थी। तब दलीय प्रतिबद्धता की तुलना में राष्ट्र सवरेपरि था। संविधान निर्माताओं ने बजट सहित सभी धन विधेयकों के लिए लोकसभा को ज्यादा अधिकार संपन्न बनाया। लोकसभा के बहुमत को ही सरकार चलाने का आधार बनाया गया। लोकसभा को ही अविश्वास प्रस्ताव रखने का अधिकार मिला। राज्यसभा ने अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। संसदीय परंपरा के विकास में इस सदन का महत्वपूर्ण योगदान है। संविधान सभा (3 जनवरी 1949) में इस सदन को बनाने पर विवाद हुआ था। लोकनाथ मिश्र (उड़ीसा) ने द्वितीय सदन का विरोध किया था। एम. अनंत शयनम् आयंगर (मद्रास) ने कहा था कि हम विभिन्न लोगों को राजनीति में भाग लेने का मौका दें। इसलिए दूसरा सदन जरूरी है। अगर निचला सदन आवेश में कोई कानून तुरंत पास करता है तो ऊपरी सदन तक उसके पहुंचने तक बीच में आए समय व्यवधान से आवेश का प्रशमन होगा और कानून पर सही विचार होगा। लेकिन आज की स्थिति भिन्न है। मोदी सरकार ने हड़बड़ी या आवेश में विधेयक नहीं बनाए। लोकसभा ने उन्हें किसी आवेश में नहीं पारित किया। विपक्षी दल ही आवेश में हैं। विधेयक के गुण-दोष पर चर्चा है ही नहीं। सरकार को पराजित करना ही मुख्य लक्ष्य हो गया है। दूसरा सदन वरिष्ठ है। यहां नीर, क्षीर, विवेक का काम होना चाहिए। दुनिया के आधे देशों में दूसरे सदन नहीं हैं। चीन, अंगोला, आर्मेनिया, बुल्गारिया, मध्य अफ्रीकी गणतंत्र, न्यूजीलैंड, मारीशस, लीबिया, लेबनान, उत्तर व दक्षिण कोरिया, ग्रीस, मिस्न, टर्की, डेनमार्क, पुर्तगाल और श्रीलंका सहित अनेक देशों में एकसदनीय व्यवस्था है। भारत की द्विसदनीय व्यवस्था बेशक अच्छी है, लेकिन विपक्ष इसका सदुपयोग नहीं कर रहा है।
राज्यसभा धीर-गंभीर सदन है। संकीर्ण दलीय लड़ाई का मंच नहीं। यह गहन विचार-विमर्श का सभा मंडप है। उसने जन-आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व किया भी है। संविधान के कृपा प्रसाद और जनादेश से विधि निर्वाचित सरकार को काम करने का अवसर दिया जाना चाहिए। यहां विराजमान अधिकांश सदस्य अनुभव और वरिष्ठता में बेजोड़ हैं। उन्हें सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों को तेज रफ्तार गतिशील करने की प्रेरणा देनी चाहिए। भाजपा से किसी की भी असहमति हो सकती है। होनी भी चाहिए। जनतंत्र में असहमतियां होती भी हैं, लेकिन आदर्श जनतंत्र में सहमति और असहमति का द्वंद्व नहीं ‘मिलन’ होना चाहिए। यही राष्ट्रहितैषी होता है। बेशक हां और न का साथ नहीं हो सकता, लेकिन दो और दो को चार कहने में हां और न का संघर्ष बेमतलब है?
सर्वानुमति और सबका साथ जनतंत्री आदर्श है, लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य मुद्दा आधारित सोच का नहीं है। बेशक सभी दल राष्ट्र हितैषी हैं। लेकिन सबकी अपनी राजनीति है। कानून निर्माण में राजनीति चलाने की आवश्यकता नहीं होती। संसदीय कानून बनाना पूरे भारत को एक विशेष व्यवस्था व संयम नियम में बांधना है। इसे वोट बैंक राजनीति से नहीं जोड़ा जा सकता। सत्तादल को अपने नीति, कार्यक्रम चलाने और व्यवस्था में जरूरी बदलाव लाने के अधिकार जनता ही देती है। ऐसे बदलाव जनविरोधी होंगे तो जनता उसे दंडित करेगी ही। जनादेश प्राप्त सरकार के हरेक काम में अडं़गा डालने का सीधा अर्थ है-देश के करोड़ों लोगों की भावना व जनादेश का अपमान। विपक्षी दल स्वयं को प्रगतिशील कहते हैं। परंपरा से भी आगे निकलने वाली गति प्रगति है। अड़ंगेबाजी प्रगति नहीं। ब्रिटिश जन पक्के परंपरावादी हैं, तो भी उन्होंने अपनी संसदीय परंपरा का प्रगतिशील विकास किया। भारत को भी समय की चुनौती अनुरूप गहन विचार विमर्श करना चाहिए। संप्रति राजनीतिक सुधारों के साथ संसदीय परिपाटी और विधायी परंपरा के एक एक बिंदु पर व्यापक राष्ट्रीय बहस की आवश्यकता है। राष्ट्र अधीर है। उसे काम चाहिए और काम के परिणाम भी चाहिए। [लेखक हृदयनारायण दीक्षित, उप्र विधान परिषद के सदस्य हैं]
Source: Jagran.Com
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हृदयनारायण दीक्षित, उप्र विधान परिषद के सदस्य हैं)

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