शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

शोच-विचार : पर उपदेश कुशल बहुतेरे

धार्मिक सहिष्णुता और पंथनिरपेक्षता के मामले में खुद अमेरिका को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं बलबीर पुंज

मंगलवार को दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे सामने आ जाएंगे। अभी देश में घटी कुछ घटनाओं का क्या दिल्ली विधानसभा चुनाव के साथ कुछ संबंध है? प्रत्यक्ष रूप से ये घटनाएं असंबंधित हैं, परंतु परोक्ष रूप से क्या उनके तार आपस में जुड़े हुए हैं? चुनाव से कुछ सप्ताह पूर्व दिल्ली के कुछ चर्चो पर हमले क्या किसी षड्यंत्र के भाग हैं? जिस तरह से चर्च के स्थानीय नेताओं और सेक्युलरिस्टों ने इस मुद्दे को तूल दिया और अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान (राष्ट्रपति सहित) ने इस घटनाक्रम का अंतरराष्ट्रीयकरण किया, क्या वह महज संयोग है? या यह एक सोची-समझी साजिश के तहत राजनीतिक उद्देश्यों को लेकर भारत की कालजयी बहुलतावादी संस्कृति के शत्रुओं की युगलबंदी है?

भारत के साधारण ईसाई उतने ही राष्ट्रभक्त और अच्छे नागरिक हैं, जितने अन्य मत के मानने वाले हैं, किंतु चर्च के एक भाग और विदेशी शक्तियों के बीच मिलीभगत की यह आशंका निराधार नहीं है। सदियों से चर्च ने साम्राज्यवादी विदेशी शक्तियों के साथ मिलकर भारत को सांस्कृतिक रूप से गुलाम बनाने का षड्यंत्र किया है। यह स्थापित सत्य है कि ब्रिटिश साम्राज्य के साथ मिलकर मतांतरण के माध्यम से चर्च ने इस सनातन राष्ट्र की संस्कृति और परंपराओं को नष्ट करने का प्रयास किया है। गिरजाघरों के ऊपर अभी हाल के हमलों की सच्चाई क्या है? केंद्र सरकार को सौंपी रिपोर्ट में दिल्ली पुलिस ने बताया है कि पिछले एक साल में 265 मंदिरों में लूटपाट की घटनाएं हुईं। हाल ही में हिमाचल प्रदेश के कुल्लू से सदियों पुरानी और विश्व प्रसिद्ध रघुनाथजी की मूर्ति चोरी हो गई थी। कुछ मंदिरों से शिवलिंग चोरी हो गए। इन सब घटनाओं के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए?

भारत दौरे में बराक ओबामा ने कहा था, ‘‘हर व्यक्ति को बगैर किसी डर, भेदभाव या दबाव के धार्मिक मान्यताओं के पालन की आजादी होनी चाहिए। भारत भी तब तक सफल होता रहेगा, जब तक वह मजहबी आधार पर नहीं बंटेगा।’’ प्रश्न यह उठता है कि भारत को मजहबी आधार पर बांटने का घृणित काम कौन कर रहा है? क्या यह सत्य नहीं कि 1947 में भारत को मजहबी आधार पर बांटने का काम भारत के वामपंथियों, साम्राज्यवादी ब्रिटेन और इस्लामी कट्टरवाद के संयुक्त प्रयासों का परिणाम था? और क्या यह भी सच नहीं कि पिछले कई सौ वर्षो से चर्च का एक बड़ा भाग (जिसमें यूरोप के कई देश, पुर्तगाल, स्पेन और इंग्लैंड) और अमेरिका के सहयोग से मजहबी आजादी के नाम पर झूठ, फरेब, लालच व भय दिखाकर मतांतरण करने का पाप करता रहा है और जिसके फलस्वरूप भारत में मजहबी दरारें पैदा होती हैं?

दिल्ली के चुनाव से ठीक दो दिन पहले ओबामा ने कहा, ‘‘भारत विविधता से भरा देश है, लेकिन ऐसी जगह है, जहां पिछले कुछ वर्षो में सभी तरह की धार्मिक निष्ठा को दूसरे धर्म के लोगों ने समय-समय पर अपनी विरासत व मान्यता की वजह से निशाना बनाया है। इस असहिष्णुता की वजह से उस देश को आजाद कराने में मदद करने वाले गांधीजी आहत होते।’’ इस वक्तव्य के पीछे ओबामा का मंतव्य क्या है? क्या उनका यह ज्ञान अमेरिका की मानवाधिकारों और मजहबी स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्धता के कारण है? सच में अंतरराष्ट्रीय पटल पर अमेरिका की निष्ठा किसी किस्म के आदर्श के लिए नहीं है, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों तक सीमित है। यदि पंथनिरपेक्षता के मूल्यों के साथ अमेरिका की कोई प्रतिबद्धता होती तो उसे अफगानिस्तान, पाकिस्तान, सऊदी अरब जैसे देशों के साथ कोई संबंध ही नहीं रखने चाहिए, जहां अल्पसंख्यकों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उपासना के अधिकार पर कड़ा पहरा है। अमेरिका को चीन के साथ भी कोई संबंध नहीं रखने चाहिए, जहां विचार भिन्नता को बुरी तरह कुचला जाता है।

गांधीजी को इस बात से अत्यधिक कष्ट होता कि अमेरिका जैसे देश का राष्ट्रपति उस मजहबी स्वतंत्रता को लेकर भारत को उपदेश दे रहा है, जिसने भारत में मजहब के आधार पर दरार डालने में महती भूमिका निभाई है। गांधीजी जीवन भर पादरियों के मतांतरण के प्रयासों से बहुत कष्ट में रहे। अपनी आत्मकथा में गांधीजी ने लिखा है, ‘‘उन दिनों ईसाई मिशनरी हाईस्कूल के पास एक नुक्कड़ पर खड़े हो हिंदुओं तथा देवी-देवताओं पर गालियां उड़ेलते हुए अपने पंथ का प्रचार करते।..यह भी सुना है कि नया ‘कन्वर्ट’ (मतांतरित) अपने पूर्वजों के धर्म को, उनके रहन-सहन को तथा उनके देश को गालियां देने लगा है। इन सबसे मुझमें ईसाइयत के प्रति नापसंदगी पैदा हो गई।’’

गांधीजी से मई, 1935 में एक मिशनरी नर्स ने पूछा कि क्या आप मिशनरियों के भारत आगमन पर रोक लगाना चाहते हैं तो जवाब में गांधीजी ने कहा था, ‘‘अगर सत्ता मेरे हाथ में हो और मैं कानून बना सकूं तो मैं मतांतरण का यह सारा धंधा ही बंद करा दूं। मिशनरियों के प्रवेश से उन हिंदू परिवारों में, जहां मिशनरी पैठे हैं, वेशभूषा, रीति-रिवाज और खानपान तक में अंतर आ गया है।’’ अमेरिकी राष्ट्रपति का उपदेश कितना प्रासंगिक और प्रामाणिक है? सनातनी मूल्यों और बहुलतावाद के कारण भारत में जहां ऊर्जावान प्रजातंत्र और पंथनिरपेक्षता अक्षुण्ण है, वहीं अफगानिस्तान और पाकिस्तान में मजहबी सहिष्णुता के लिए कोई स्थान नहीं है। विडंबना यह है कि पाकिस्तान जैसे देश, जहां मजहबी कट्टरवाद को पोषित कर गैर-मुस्लिमों से करीब-करीब छुटकारा पा लिया गया है और जो जिहाद के जहर से दुनिया को लहूलुहान कर रहा है, उसे अमेरिका से भारी वित्तीय मदद और संरक्षण मिलता है।

दिल्ली दौरे के दौरान बराक ओबामा ने संविधान की धारा 25 का उल्लेख किया था। भारत इसलिए लोकतांत्रिक और पंथनिरपेक्ष नहीं है कि हमारे संविधान में ये व्यवस्थाएं निहित हैं। पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक संविधान भारत की कालजयी सनातन संस्कृति के बहुलतावादी दर्शन से संभव हुआ है। उसी दर्शन ने भारतीयों को ‘एक सत् विप्रा: बहुधा वदंति’ की प्रेरणा दी। उसी सनातनी जीवन मूल्यों ने हमें सारे संसार को एक परिवार (वसुधैव कुटुंबकम्) समझने की शिक्षा दी। अमेरिका को अभी ये सारे जीवन मूल्य आत्मसात् करने बाकी हैं। चर्च सहित ऐसे कई संगठनों को अमेरिका से भारी वित्तीय सहायता मिलती है। इनमें से बहुत सारे गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) के रूप में काम करते हैं और स्पष्टत: मजहब का उपयोग करके न केवल देश के विकास को बाधित करते हैं, बल्कि मजहब के नाम पर भारत को तोड़ने का काम भी करते हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले जिहादियों के साथ-साथ चर्च और अमेरिका, दोनों की भूमिका संदिग्ध है। अमेरिका को समझ में आना चाहिए कि भारत उसके और उसके दलालों के माध्यम से भारत में हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करेगा।

(लेखक राज्यसभा सदस्य हैं)

 गांधीजी को इस बात से कष्ट होता कि उस अमेरिका का राष्ट्रपति मजहबी आजादी का उपदेश हमें दे रहा है जिसने भारत में मजहब के आधार पर दरार डालने में महती भूमिका निभाई है

अमेरिका को समझ में आना चाहिए कि उसके माध्यम से देश में हस्तक्षेप भारत बर्दाश्त नहीं करेगा

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