सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

प्रकाश चन्द्र नायक के साथ चैटिंग वार्ता (बलिदान-दिवस)

Chat with Prakash Chandra Nayak - Forwarded message From: "Basudeb Paul"
पढे श्री प्रकाश चन्द्र नायक ने चैटिंग मे क्या क्या वातें किया. यह टाफार समाचार का एक नई और अनौखी पेशकश.
Feb 21, 6:20 PM - Prakash Chandra Nayak: 🍁       🚩॥ ॐ॥ 🚩      🍁
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21 फरवरी/बलिदान-दिवस

अमर बलिदानी वीरेन्द्रनाथ दत्त

क्रान्तिकारी वीरेन्द्रनाथ दत्त गुप्त का जन्म 20 जून, 1889 को बालीगाँव हाट (साहीगंज, बंगाल) में हुआ था। उनके पिता श्री उमाचरण का देहान्त तब ही हो गया था, जब वे केवल नौ वर्ष के थे। माता वसन्त कुमारी की गोद में पले वीरेन्द्र ने बालीगाँव हाट, साहीगंज और कोलकाता में शिक्षा पायी। स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण वे कक्षा दस की परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर पाये।

उन दिनों विप्लवी दल ‘सुहृद समिति’ के कार्यकर्ता सतीश चन्द्र सेन राधानाथ हाईस्कूल में पढ़ाते थे। उन्होंने वीरेन्द्र को समिति में भर्ती कर प्रशिक्षण देना प्रारम्भ किया। वे उसी गाँव में तरुणों को व्यायाम के साथ ही लाठी व छुरेबाजी का अभ्यास कराते थे। 

इससे वहाँ के मुस्लिम बहुत नाराज होते थे। उन्होंने कई बार उस व्यायामशाला में उपद्रव करने का प्रयास किया; पर वीरेन्द्र तथा उसके साथियों की उग्र तैयारी देखकर वे पीछे हट गये। यद्यपि ‘आत्मोन्नति समिति’ के चाँदपुर, हमालपुर आदि स्थानों पर चल रहे व्यायाम केन्द्रों पर वे हमला करने में सफल रहे। उन दिनों इसी प्रकार के नामों से क्रान्तिकारी युवक एकत्र होते थे।

उन दिनों पुलिस उपाधीक्षक मौलवी शम्सुल आलम अलीपुर बम काण्ड की जाँच कर रहा था। वह अंग्रेज भक्त तथा लीगी मानसिकता का व्यक्ति था। उसकी इच्छा थी कि अधिकाधिक क्रान्तिकारियों को फाँसी के फन्दे तक पहुँचाया जाये। हावड़ा षड्यन्त्र केस में भी इसके प्रयास से अनेक क्रान्तिकारियों को लम्बी सजा हुई थी। 

इसने अलीपुर काण्ड में 40 हिन्दू युवकों को आरोपी बनाकर 206 झूठे गवाह न्यायालय में खड़े किये। इस पर ‘विवेकानन्द समिति’ के नाम से काम कर रहे विप्लवियों ने शम्सुल आलम को उसके पापों का दण्ड देकर जहन्नुम भेजने का निर्णय ले लिया।

यह काम सतीश सरकार, यतीश मजूमदार और वीरेन्द्रनाथ दत्त को सौंपा गया। सुरेश मजूमदार ने वीरेन्द्र को रिवाल्वर दिया और वे सब 24 जनवरी, 1910 को न्यायालय पहुँच गये। उस दिन वहाँ अलीपुर बम काण्ड की सुनवाई शुरू हुई। 

मौलवी शम्सुल आलम बड़ी तत्परता से अपने काम में लगा था। क्रान्तिकारी भी ताक में थे। अचानक शम्सुल किसी काम से न्यायालय से बाहर आया, बस वीरेन्द्र दत्त ने निशाना साधकर गोली दाग दी। शम्सुल के मुँह से ‘या खुदा’ निकला और उसने वहीं दम तोड़ दिया।

सतीश मजूमदार तो वहाँ से फरार होने में सफल हो गये; पर वीरेन्द्र ने बचने का कोई विशेष प्रयास नहीं किया। अतः वे पुलिस की शिकंजे में फँस गये। इसके कुछ समय बाद इस काण्ड से जुड़े कुछ अन्य क्रान्तिकारी भी पुलिस की गिरफ्त में आ गये; पर शम्सुल के वध से इतना लाभ अवश्य हुआ कि गवाहों के मन में भय बैठ गया। पुलिस केवल छह युवकों पर ही आरोप सिद्ध कर सकी। इसका श्रेय निःसन्देह वीरेन्द्र दत्त को ही है।

पुलिस ने वीरेन्द्र पर अनेक अत्याचार किये; पर वे उससे कोई रहस्य नहीं उगलवा सके। अन्ततः न्यायाधीश लारेन्स जेकिन्स ने वीरेन्द्र को फाँसी की सजा सुना दी। फाँसी से एक दिन पूर्व वीरेन्द्र के बड़े भाई धीरेन्द्र दत्त मिलने आये, तो वीरेन्द्र ने कहा, ‘‘दादा, यह गर्व करने की बात है कि कल मैं मातृभूमि की सेवा में फाँसी पर चढ़ रहा हूँ। यह समय आनन्द का है, शोक का नहीं।’’

21 फरवरी, 1910 को वन्दे मातरम् का उद्घोष करते हुए वीर वीरेन्द्रनाथ दत्त फाँसी पर झूल गये।
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🚩आप का दिन मंगलमय रहें।🚩
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Feb 21, 6:20 PM - Prakash Chandra Nayak: 🍁       🚩॥ ॐ॥ 🚩      🍁
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🌺पूज्य डॉक्टर जी भाग-92, 93🌺
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( पूजनीय डॉक्टर हेडगेवार भाग-92)

जिस वर्ष कारागृह से डॉक्टरजी छूटे उस वर्ष की एक और उल्लेखनीय घटना है, नागपुर के ‘अनाथ विद्यार्थी गृह’ की स्थापना। उसी वर्ष गणेशचतुर्थी के दिन डॉक्टरजी के मित्र श्री गोविन्द गणेश चोळकर ने यह संस्था शुरू की। इसमें उन्हें डॉक्टरजी का सहयोग मिला था। इसमें सन्देह नहीं कि श्री चोळकर द्वारा स्थापित यह संस्था निर्धन विद्यार्थियों के लिए अत्यन्त उपकारक सिद्ध हुई है। परन्तु इस संस्था ने नगर के बाहर भण्डारामार्ग पर स्थान मिलने के उपरान्त प्रान्त-प्रान्त से आये हुए भूमिगत क्रान्तिकारियों को भी समय-समय पर आश्रय देने का भारी काम किया है। इस स्थान पर कुछ दिनों डॉक्टरजी ने शस्त्रास्त्र की पेटियाँ भी छिपायी थीं तथा क्रान्तिकारियों को वहाँ रखकर नित्य नियमपूर्वक उनको भोजन पहुँचाने की व्यवस्था की थी। उस समय भोजन का डिब्बा पहुँचानेवाले श्री तात्या तेलंग तथा भेदी आदि कुछ चुने हुए तरुणों को इस बात का पता है। इस संस्था के कार्यकारी-मण्डल में प्रारम्भ से लेकर अन्त तक डॉक्टरजी का समावेश था तथा वे बीच-बीच में इसके काम की ओर ध्यान भी देते थे। कालक्रम से आगे की होने पर भी विषयानुषंग से एक और बात की चर्चा यहीं कर देना युक्तिसंगत होगा। एक बार ‘अनाथ विद्यार्थी गृह’ के दो बालको को एक मिशनरी महिला भगाकर ले गयी थी। डॉक्टरजी ने अपने सहकारियों के साथ बहुत प्रयत्न करके वे बच्चे वापिस ला दिये। इस बात का उल्लेख संस्था के 1926 के प्रतिवेदन में श्री गोविन्द राव चोळकर ने दिया है। 
इन दिनों विभिन्न परिषदों में जाने का काम भी शुरू ही था तथा डॉ. मुंजे द्वारा स्थापित ‘रायफल एसोसिएशन’ में भी डॉक्टरजी भाग लेते थे। उनकी यह दृढ़ धारणा थी कि अनुशासन, संचालन तथा लक्ष्यभेद, ये बातें पददलित राष्ट्र का स्वत्व बनाये रखने के लिए बहुत उपयुक्त हैं। यह धारणा अहिंसा के उस ढीले-पोले वातावरण में भी लव मात्र कम नहीं हुई थी। कलकत्ता में रहते हुए ही उन्होंने निशाना लगाना सीखा था। इसलिए सुविधा मिली तो वे अपने मित्र श्री भाऊसाहब टालाटुले के साथ बड़े शौक से शिकार के लिए भी जाते थे। इस अवसर पर दो-तीन दिन जंगल में ही रहना पड़ता था। ऐसे ही एक अवसर पर वान्नेरा ग्राम में एक वृक्ष पर बेंगन टाँगकर उसका निशाना लगाने ही होड़ लग गयी। उस समय केवल डॉक्टरजी ने अचूक निशाना लगाकर शेष सबको हरा दिया था। एक दूसरे अवसर पर उनके एक मित्र ने यह समझकर कि बन्दूक में कारतूस नहीं है घोड़ा दबा दिया। डॉक्टरजी के बिल्कुल निकट से सूंऽऽऽ करती हुई गोली चली गयी। बिल्कुल अंग से सटकर जानेवाली मृत्यु का वर्णन करते हुए डॉक्टरजी कहते थे कि ‘‘गोली हो या न हो, पर किसी भी व्यक्ति पर मजाक में निशाना नहीं लगना चाहिए।’’

( पूजनीय डॉक्टर हेडगेवार भाग-93)

नगर में कोई नया काम प्रारम्भ हो और उसमें डॉक्टरजी न हो, ऐसा सहसा नहीं हो सकता था। 1922 में होनेवाले खेलों की प्रान्तीय समिति में भी उनका नाम मिलता है। महाल में ‘नरसिंह सिनेमाघर’ के पास के हनुमानजी के मन्दिर में होनेवाली दैनिक सायं-प्रार्थना में भी वे अन्य लोगों के साथ उपस्थित रहते थे। स्वाध्याय-मण्डलों में जाकर जैसे वे चर्चा में भाग लेते थे वैसे ही मित्रों के यहाँ क्रमानुसार होनेवाले प्रीतिभोज में भी सम्मिलित होते थे। जहाँ कुछ समवयस्क व्यक्ति एकत्र हों तथा राष्ट्रीय एवं सामाजिक दृष्टि से कुछ कार्यक्रम हो वहाँ वे प्रयत्नपूर्वक जाते थे। शराब की भट्टियों के सामने प्रदर्शन करनेवालों की पीठ पर भी वे हाथ फिराते थे तथा उसी प्रकार बालक-बालिकाओं द्वारा अत्यन्त चाव से प्रारम्भ किये गये गणेशोत्सव के आयोजनों में भी अपनी गरीबी की चिन्ता न करते हुए चन्दा देते थे। 
कुछ लोगों को यह भी स्मरण है कि इन दिनों डॉक्टरजी ने नागपुर के ‘खण्डोबा’ के मन्दिर में कवि परमानन्द-कृत ‘शिव भारत’ पर कुछ प्रवचन भी किये थे। उस काल के प्रवचन का स्वरूप भी विशेष रहता था। प्रा.ना.सी. फडके इस विषय में लिखते हैं कि ‘‘वक्ता ने व्याख्यान के विषय मे रूप में चाहे गीता का एकाध श्लोक अथवा दासबोध का वचन रखा हो पर गीता अथवा दासबोध के आधार से वह राजनीति और वह भी लोकमान्य तिलक की उग्र राजनीति पर ही बोलता था।’’ निश्चित ही डॉक्टरजी का प्रवचन इसी प्रकार का रहा होगा। 
उस वर्ष कलकत्ता में हुई क्रान्तिकारियों की एक गुप्त बैठक में भी वे गये थे। परन्तु बाह्य कारण उन्होंने यही प्रकट किया था कि ‘‘नेशनल मेडिकल कॉलेज के पूर्व-छात्रों के एक सम्मेलन में जा रहा हूँ।’’ इस बैठक में क्या निश्चित हुआ इसको जानने का कोई साधन नहीं है। परन्तु उन दिनों क्रान्तिकारियों के छितर-बितर हो जाने के कारण समय अत्यन्त प्रतिकूल था। अतः कुछ दिन रुककर योग्य अवसर की बाट देखते हुए अपना बल बढ़ाते रहे, यही सम्भवतः निश्चित हुआ होगा।
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🚩आपका दिन मंगलमय रहें।🚩
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Feb 22, 6:34 AM - Prakash Chandra Nayak: 🍁       🚩॥ ॐ॥ 🚩      🍁
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21 फरवरी/पुण्य-तिथि

कित्तूर की वीर रानी चेन्नम्मा

कर्नाटक में चेन्नम्मा नामक दो वीर रानियां हुई हैं। केलाड़ी की चेन्नम्मा ने औरंगजेब से, जबकि कित्त्ूार की चेन्नम्मा ने अंग्रेजों से संघर्ष किया था। 

कित्तूर के शासक मल्लसर्ज की रुद्रम्मा तथा चेन्नम्मा नामक दो रानियां थीं। काकतीय राजवंश की कन्या चेन्नम्मा को बचपन से ही वीरतापूर्ण कार्य करने में आनंद आता था। वह पुरुष वेश में शिकार करने जाती थी। ऐसे ही एक प्रसंग में मल्लसर्ज की उससे भेंट हुई। उसने चेन्नम्मा की वीरता से प्रभावित होकर उसे अपनी दूसरी पत्नी बना लिया। 

कित्तूर पर एक ओर टीपू सुल्तान तो दूसरी ओर अंग्रेज नजरें गड़ाये थे। दुर्भाग्यवश चेन्नम्मा के पुत्र शिव बसवराज और फिर कुछ समय बाद पति का भी देहांत हो गया। ऐसे में बड़ी रानी के पुत्र शिवरुद्र सर्ज ने शासन संभाला; पर वह पिता की भांति वीर तथा कुशल शासक नहीं था। स्वार्थी दरबारियों की सलाह पर उसने मराठों और अंग्रेजों के संघर्ष में अंग्रेजों का साथ दिया। 

अंग्रेजों ने जीतने के बाद सन्धि के अनुसार कित्तूर को भी अपने अधीन कर लिया। कुछ समय बाद बीमारी से राजा शिवरुद्र सर्ज का देहांत हो गया। चेन्नम्मा ने शिवरुद्र के दत्तक पुत्र गुरुलिंग मल्लसर्ज को युवराज बना दिया।

पर अंग्रेजों ने इस व्यवस्था को नहीं माना तथा राज्य की देखभाल के लिए धारवाड़ के कलैक्टर थैकरे को अपना राजनीतिक दूत बनाकर वहां बैठा दिया। कित्तूर राज्य के दोनों प्रमुख दीवान मल्लप्पा शेट्टी तथा वेंकटराव भी रानी से नाराज थे। वे अंदर ही अंदर अंग्रेजों से मिले थे। 

थैकरे ने रानी को संदेश भेजा कि वह सारे अधिकार तुरंत मल्लप्पा शेट्टी को सौंप दे। रानी ने यह आदेश ठुकरा दिया। वे समझ गयीं कि अब देश और धर्म की रक्षा के लिए लड़ने-मरने का समय आ गया है। रानी अपनी प्रजा को मातृवत प्रेम करती थीं। अतः उनके आह्नान पर प्रजा भी तैयार हो गयी। गुरु सिद्दप्पा जैसे दीवान तथा बालण्णा, रायण्णा, जगवीर एवं चेन्नवासप्पा जैसे देशभक्त योद्धा रानी के साथ थे।

23 अक्तूबर, 1824 को अंग्रेज सेना ने थैकरे के नेतृत्व में किले को घेर लिया। रानी ने वीर वेश धारण कर अपनी सेना के साथ विरोधियों को मुंहतोड़ उत्तर दिया। थैकरे वहीं मारा गया और उसकी सेना भाग खड़ी हुई। कई अंग्रेज सैनिक तथा अधिकारी पकड़े गये, जिन्हें रानी ने बाद में छोड़ दिया; पर देशद्रोही दीवान मल्लप्पा शेट्टी तथा वेंकटराव को फांसी पर चढ़ा दिया गया।

स्वाधीनता की आग अब कित्तूर के आसपास भी फैलने लगी थी। अतः अंग्रेजों ने मुंबई तथा मद्रास से कुमुक मंगाकर फिर धावा बोला। उन्हें इस बार भी मुंह की खानी पड़ी; पर तीसरे युद्ध में उन्होंने एक किलेदार शिव बासप्पा को अपने साथ मिला लिया। उसने बारूद में सूखा गोबर मिलवा दिया तथा किले के कई भेद शत्रुओं को दे दिये। अतः रानी को पराजित होना पड़ा।

अंग्रेजों ने गुरु सिद्दप्पा को फांसी पर चढ़ाकर रानी को धारवाड़ की जेल में बंद कर दिया। देशभक्त जनता ने रानी को मुक्त कराने का प्रयास किया; पर वे असफल रहे। पांच वर्ष के कठोर कारावास के बाद 21 फरवरी, 1929 को धारवाड़ की जेल में ही वीर रानी चेन्नम्मा का देहांत हुआ।

रानी ने 23 अक्तूबर को अंग्रेजों को ललकारा था। उनकी याद में इस दिन को दक्षिण भारत में ‘महिला दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।


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Feb 22, 6:34 AM - Prakash Chandra Nayak: 🍁       🚩॥ ॐ॥ 🚩      🍁
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21 फरवरी/जन्म-दिवस

विदेशी शरीर में भारतीय आत्मा श्रीमां

21 फरवरी, 1878 को फ्रांस की राजधानी पेरिस में जन्मी श्रीमां का पूर्व नाम मीरा अल्फांसा था। उनके पिता श्री मोरिस एक बैंकर तथा माता श्रीमती मातिल्डा अल्फांसा थीं। उनके मिस्र के राजघराने से रक्त संबंध थे। अभिभावकों ने उनका नाम परम कृष्णभक्त मीराबाई के नाम पर क्यों रखा, यह कहना कठिन है; पर इससे उनके भावी जीवन का मार्ग अवश्य प्रशस्त हो गया। चार वर्ष की अवस्था से ही वे कुर्सी पर बैठकर ध्यान करने लगी थी। उन्हें लगता कि एक ज्योति शिरोमंडल में प्रवेश कर असीम शांति प्रदान करती है। सामान्य बच्चों की तरह खेलकूद में मीरा की कोई रुचि नहीं थी। 

12-13  वर्ष की अवस्था तक वे कई घंटे ध्यान में डूबने लगीं। इधर पढ़ाई में वे सामान्य पाठ्यक्रम के साथ ही गीत, संगीत, नृत्य, साहित्य, चित्रकला आदि में भी खूब रुचि लेती थीं। उन्हें लगता था कि उनका सूक्ष्म शरीर रात में भौतिक शरीर से बाहर निकल जाता है। उन्हें लगता कि उनका विशाल सुनहरा परिधान पूरे पेरिस नगर के ऊपर छाया हुआ है, जिसके नीचे आकर और उसे छूकर दुनिया के हजारों लोग अपने दुखों से मुक्ति पा रहे हैं। 

मीरा को नींद में ही कई ऋषियों से अनेक अलौकिक शिक्षाएं मिलीं। एक प्रभावी व्यक्तित्व उन्हें प्रायः दिखाई देता था, जिसे वे कृष्ण कहती थीं। उन्हें लगता था कि वे इस धरा पर हैं और उनके साथ रहकर ही उन्हें कार्य करना है। आगे चलकर उन्होंने अल्जीरिया के ‘तेमसेम’ नामक स्थान पर गुह्य विद्या के गुरु ‘तेओ’ दम्पति से इसकी विधिवत शिक्षा ली। इससे उनमें कहीं भी प्रकट होने तथा सूक्ष्म जगत की घटनाओं के बारे में जानने की क्षमता आ गयी। 

1904 में एक योगी ने उन्हें गीता का फ्रेंच अनुवाद दिया। इसे पढ़कर मीरा के मन में भारत और हिन्दू धर्म को जानने की जिज्ञासा बढ़ गयी। उन्हें किसी ने एक गुह्य चक्र यह कहकर दिया था कि जो इसका रहस्य बताएगा, वही उनका पथ प्रदर्शक होगा। उन दिनों पांडिचेरी फ्रांस के अधीन था तथा एक सांसद वहां से चुना जाता था। मीरा के पति पॉल रिशार इसके लिए पांडिचेरी आये। 

आते समय मीरा ने वह गुह्य चक्र उन्हें देकर किसी योगी से उसका रहस्य पूछने को कहा था। श्री अरविंद ने यह रहस्य उन्हें बता दिया। जब पति ने वापस जाकर मीरा को यह कहा, तो मीरा तुरन्त पांडिचेरी के लिए चल दीं। 29 मार्च, 1914 को उन दोनों की भेंट हुई। श्री अरविंद उनका स्वागत करने के लिए आश्रम के द्वार पर खड़े थे। मीरा ने देखा कि वे ध्यान के समय जिस महामानव के दर्शन करती थीं, वह श्रीकृष्ण वस्तुतः श्री अरविन्द ही हैं।

मीरा एक वर्ष वहां रहकर फिर फ्रांस, जापान आदि गयीं। इसके बाद वे 24 अपै्रल, 1920 को सदा के लिए पांडिचेरी आ गयीं। नवम्बर 1926 में श्री अरविंद ने आश्रम का पूरा कार्यभार उन्हें सौंप दिया। उनके नेतृत्व में हजारों लोग आश्रम से जुडे़ तथा ओरोविल में ‘श्री अरविंद अंतरराष्ट्रीय शिक्षा केन्द्र’ जैसी कई नयी गतिविधियां प्रारम्भ हुईं, जो आज भी चल रही हैं।

श्रीमां का शरीर भले ही विदेशी था; पर उनकी आत्मा भारतीय थी। वे भारत को अपना असली देश तथा श्री अरविंद की महान शिक्षाओं को मूर्त रूप देना ही अपने जीवन का लक्ष्य मानती थीं। वे कहती थीं कि जगत का गुरु बनना ही भारत की नियति है। 17 नवम्बर, 1973 को अपनी देह त्यागकर वे सदा के लिए अपने पथ प्रदर्शक श्रीकृष्ण के चरणों में लीन हो गयीं। 
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Feb 22, 6:42 AM - Prakash Chandra Nayak: 🍁       🚩॥ ॐ॥ 🚩      🍁
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22 फरवरी/पुण्य-तिथि

सेवा का अक्षय वट माधवराव परलकर

सेवा का क्षेत्र बहुत व्यापक है। जिस व्यक्ति पर कष्ट पड़ता है, उसकी सेवा तो पुण्य है ही; पर उनके सम्बन्धियों के कष्ट भी कम नहीं होते।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता जनजीवन से जुड़े होते हैं। उन्होंने ऐसे रोगियों और उनके परिचारकों के लिए अनेक सेवा केन्द्रों की स्थापना की है। इनमें मुम्बई का ‘नाना पालकर रुग्ण सेवा केन्द्र’ भी एक है। इसके प्राण थे संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री माधवराव परलकर।

माधवराव अपने बाल्यकाल से ही संघ की शाखा से जुड़ गये थे। उन्होंने 1947 में ‘आयुर्वेद प्रवीण’ की उपाधि ली। तब वे चाहते तो कहीं नौकरी या चिकित्सालय खोल सकते थे; पर वे संघ के प्रचारक के नाते अपना जीवन बिताने का निश्चय कर चुके थे। उन्हें मुम्बई में बान्द्रा से विरार और फिर चेम्बूर तक का क्षेत्र शाखाओं के विस्तार के लिए सौंपा गया। माधवराव ने अपनी साइकिल के बल पर अनेक नयी शाखाएँ खोलीं। उनके मधुर व्यवहार और परिश्रम से प्रभावित होकर सैकड़ों नये कार्यकर्ता संघ से जुड़े। 

उनकी संगठन क्षमता, वार्तालाप की सुमधुर शैली और युवाओं के बीच लोकप्रियता देखकर 1961 में उन्हें मुम्बई नगर का अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का संगठन मन्त्री बनाया गया। उस समय यह संगठन नया था; पर माधवराव ने अपने परिश्रम से इसमें जान डाल दी। इसके बाद सम्पूर्ण महाराष्ट्र प्रदेश का काम उन्हें सौंपा गया। 1962-63 में वे विद्यार्थी परिषद के अखिल भारतीय महामन्त्री बनाये गये। 

माधवराव की रुचि चिकित्सा सेवा की ओर भी थी। उन दिनों मुम्बई में ‘नाना पालकर स्मृति समिति’ स्थापित हुई थी। संघ के प्रचारक नाना पालकर का 1967 में पीलिया से देहान्त हुआ था। मुम्बई में बाहर से अनेक स्वयंसेवक इलाज के लिए आते थे। उनके निवास की व्यवस्था, उचित अस्पताल और खर्च में उनका इलाज हो जाए, यह कार्य समिति करती थी। माधवराव की सेवा में रुचि देखते हुए उन्हें इस समिति का काम सौंपा गया।

प्रारम्भ में इनके पास बहुत छोटा स्थान था। वहाँ चार-पाँच लोग ही रह सकते थे। अतः माधवराव ने नया और विशाल भवन बनवाने की योजना सबके सामने रखी। अनेक कार्यकर्ता उनके साथ जुट गये। इन सबकी प्रामाणिकता और लगन देखकर मुम्बई महानगर पालिका के अधिकारियों ने परेल में एक बड़ा भूखण्ड इन्हें दे दिया। थोड़े ही समय में वहाँ एक सात मंजिला भवन बन गया।

भवन का उद्घाटन तत्कालीन सरसंघचालक मा. रज्जू भैया, पूज्य स्वामी सत्यमित्रानन्द जी और स्वाध्याय परिवार के पांडुरंग शास्त्री आठवले जी महाराज की उपस्थिति में हुआ। इस भवन का निर्माण कार्य सरल नहीं था; पर माधवराव ने हर समस्या को शान्ति एवं धैर्य के साथ हल किया। उनकी प्रेरणा के केन्द्र संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी थे, जो उन्हें पुत्रवत स्नेह करते थे।

माधवराव परलकर योग के भी अच्छे जानकार थे। आपातकाल में जब उन्हें नासिक जेल में बन्दी बनाकर रखा गया, तो उन्होंने वहाँ भी योग की कक्षाएँ लगायीं। इससे राजनीतिक तथा अन्य बन्दी भी लाभान्वित हुए। नाना पालकर स्मृति संस्थान में भी उनके दिशा-निर्देशन में योगाभ्यास होता था। स्वयं चिकित्सक होने के कारण वे भी रोगियों का निःशुल्क उपचार करते थे। 

सेवा की सचल प्रतिमूर्ति माधवराव का 81 वर्ष की अवस्था में 22 फरवरी, 2008 को मुम्बई में ही निधन हुआ। उनकी लगन और निष्ठा से आज भी वहाँ के कार्यकर्ता प्रेरणा पा रहे हैं।
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🚩आप का दिन मंगलमय रहें।🚩
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